आयुर्वेद -- चिकित्सा के रूप में

                      आयुर्वेद --एक पुरातन चिकित्सा पद्धति 

आयुर्वेद -- एक अमूल्य निधि 

हमारा शरीर प्रकृति की  अनमोल देन है। यह तभी रोगग्रस्त होता है ,जब हम प्रकृति के विरुद्ध आहार -विहार करते हैं। यदि रोग के आरंभ में ही हम सतर्क हो जाएं तो धन और समय की बर्बादी से बच सकते हैं। उचित पथ्य ,आहार और नियमो का पालन करके शरीर को रोग रहित रखा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो मानव  शरीर अस्वस्थ हो जाएगा।परिणामतः वह चार पुरुषार्थो --धर्म ,अर्थ ,काम और मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ होगा। 


पूर्णतः स्वस्थ रहने के लिए मनीषियों ने स्वास्थ्य सम्बन्धी पांच स्तम्भों ---आहार ,व्यायाम ,सदाचार ,स्वच्छता और निद्रा का प्रतिपादन किया है जबकि 'चरक सहिंता 'में पूर्ण स्वास्थ्य के लिए आहार ,निद्रा एवं ब्रह्मचर्य को उपस्तम्भ माना गया है। अतः इनका पालन करके ही शरीर को गतिमान,दीर्घायु,सशक्त और सबल बनाया जा सकता है। 


बीमारी से कैसे बचें ---

बीमारी से बचने केलिए आवश्यक है कि रोग की उत्पति और उसके निदान की जगह स्वास्थ्य के नियमों पर ध्यान दिया जाये। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को  इस बात की जानकारी जरूर होनी चाहिए कि वह स्वस्थ तथा निरोग कैसे रहे। जीवन का लक्ष्य भोग या योग --दोनों के लिए स्वस्थ रहना प्राथमिक आवश्यकता है। स्वस्थ व्यक्ति रूखे -सूखे में भी रस  का आस्वादन कर सकता है,जबकि रोगी के लिए उसके सामने रखे छप्पन प्रकार के भोग भी बेकार है। 
स्वास्थ्य का आधार वह क्रिया नहीं है जो आप कभी -कभार करते है। उसका सीधा संबंध तो उनसे है ,जिन्हे आप आठों पहर करते है। अतः स्वस्थ रहने के लिए आचार -विचार ,रहन -सहन तथा नियम -संयम पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही ईर्ष्या ,द्वेष,लोभ,क्रोध ,चिंता आदि से बचना चाहिए।


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